क्या तलाक़-ए-हसन है?  क्या यह संवैधानिक है?

बेनज़ीर हीना ने सुप्रीम कोर्ट में तलाक़-ए-हसन की संवैधानिक वैधता चुनौती दी

क्या तलाक़-ए-हसन है?  क्या यह संवैधानिक है?

2 मई 2022 को, गाजियाबाद की पत्रकार और उस समय आठ महीने की बच्ची की मां बेनज़ीर हीना ने तलाक-ए-हसन और सभी प्रकार के गैर-न्यायिक तलाक की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की। उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ ( शरिया ) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 और मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 को भारत के संविधान के  अनुच्छेद 14 , 15 , 21 और 25 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी ।

दिसंबर 2021 में, बेनाज़ीर हीना को कथित तौर पर दुर्व्यवहारपूर्ण वैवाहिक जीवन के कारण घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। फरवरी 2022 में, उन्होंने दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद, हीना के पति ने तीन तलाक नोटिस जारी किए, जिसके परिणामस्वरूप एकतरफा तलाक हो गया।

उसी वर्ष 19 अप्रैल को हीना को उसके पति ने तलाक का पहला नोटिस दिया , जिसके बाद उसने अपने पति के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई। हालांकि, पुलिस ने कहा कि शरिया कानून के तहत तलाक हसन जायज है।

2 मई को हीना ने तलाक और कानून के संबंधित प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने के लिए अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की । उन्हें तलाक की दूसरी और तीसरी सूचना क्रमशः 19 मई और 20 जून को भेजी गई।

याचिकाकर्ता ने चुनौती दी है  तलाक़-ए-हसन शरिया कानून के तहत तलाक का एक गैर-न्यायिक रूप है, जिसके अनुसार एक पुरुष लगातार तीन महीनों तक हर महीने एक बार “तलाक़” शब्द बोलकर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। महिलाओं को तलाक़-ए-हसन के माध्यम से तलाक देने की  अनुमति नहीं है।

हीना ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 को भी चुनौती दी है , जो एक नॉन-ऑब्स्टैंटे क्लॉज़ है और विवाह के विषय में अन्य परस्पर विरोधी कानूनों पर इस अधिनियम को अधिभावी बनाती है। परिणामस्वरूप, किसी भी प्रचलित कानून के बावजूद, विवाह का विषय केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ द्वारा शासित होगा। इसी प्रकार, याचिकाकर्ता ने मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 को चुनौती दी है , यह तर्क देते हुए कि यह संविधान के भाग III के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। 

हीना की याचिका को इसी तरह की अन्य याचिकाओं के साथ संलग्न किया गया था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि न्यायिक प्रक्रिया के विरुद्ध तलाक के विवादित तरीके बहुविवाह को बढ़ावा देते हैं, जो सार्वजनिक नैतिकता के लिए हानिकारक है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि तलाक-ए-हसन मुस्लिम महिलाओं की गरिमा और मर्यादा के लिए खतरा है। याचिकाकर्ताओं ने विवादित कानूनों को चुनौती देने के साथ-साथ न्यायालय से केंद्र सरकार को लिंग-भेद रहित तलाक के आधारों और तलाक की एक समान प्रक्रिया के लिए दिशानिर्देश बनाने का निर्देश देने की प्रार्थना की। 

सुप्रीम कोर्ट ने इस्लाम में प्रचलित ‘तलाक़-ए-हसन’ की प्रक्रिया पर चिंता जताई है. यह प्रथा पति को तीन महीने के अंदर एक-एक बार ‘तलाक़’ कहकर शादी ख़त्म करने की अनुमति देती है.

इससे पहले 2017 में अदालत तीन तलाक़ यानी तलाक़-ए-बिद्दत को असंवैधानिक घोषित कर चुकी है.

अब सुप्रीम कोर्ट में तलाक़-ए-हसन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि यह प्रथा “अतार्किक, मनमानी और असंवैधानिक” है क्योंकि यह महिलाओं की समानता, सम्मान और गरिमा के अधिकारों का उल्लंघन करती है.

क्या तलाक़-ए-हसन है,  क्या यह संवैधानिक है

इस्लामिक शरीयत में तलाक़ के कई तरीक़े माने गए हैं, जिनमें से एक है तलाक़-ए-हसन. यह तरीक़ा तलाक़-ए-बिद्दत यानी तीन तलाक़ से अलग, अधिक संतुलित और विचार-विमर्श वाला माना जाता है.

तलाक़-ए-हसन में पति तीन महीनों या तीन तुहर (पीरियड) में एक-एक बार कर के “तलाक़” कहता है.

इन तीन तलाक़ के बीच पति-पत्नी को एक ही घर में रहना होता है. हालांकि, इस बीच उनके बीच शारीरिक संबंध नहीं होने चाहिए.

इस्लाम में ऐसा मानना है कि यह प्रक्रिया जल्दबाज़ी में निर्णय लेने से रोकती है और पारिवारिक विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से हल करने का मौक़ा देती है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की वकील सायमा ख़ान कहती हैं कि तलाक़-ए-हसन मुस्लिम क़ानून में अच्छा तरीक़ा माना जाता है.

उनका कहना है, “इसमें पति तीन अलग-अलग महीनों में, जब पत्नी पाक हो, एक-एक बार तलाक़ बोलता है. पहले दो तलाक़ बोलने के बाद भी रिश्ता वापस बहाल हो सकता है. तीसरे तलाक़ के बाद तलाक़ पक्का हो जाता है. वह कहती हैं कि प्रक्रिया लगभग तीन महीने की होती है, जिससे सोच-समझकर फ़ैसला करने और सुलह का अवसर मिलता है.”

सायमा कहती हैं, “भारत में यह क़ानूनी और मान्य है. हालांकि इसके नुक़सान भी हैं क्योंकि केवल पुरुष ही तलाक़ दे सकता है. इससे महिलाओं पर मानसिक और आर्थिक दबाव बढ़ता है, ख़ासकर तब जब पति ग़ायब हो जाए या नोटिस फ़र्ज़ी हो. वकील द्वारा नोटिस भेजने से वैधता पर विवाद और बढ़ जाता है.”

क़ानूनी जानकार कहते हैं कि जब ये मामले अदालत में जाते हैं तो लंबे समय तक चलते हैं. कुछ लोग इस प्रक्रिया में किसी भी हस्तक्षेप को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन मानते हैं. अक्सर लिखित दस्तावेज़ या आर्बिट्रेशन अनिवार्य न होने के कारण यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि तलाक़ वास्तव में तीन अलग-अलग तुहर में दिया गया था.

“तलाक़-ए-हसन की प्रक्रिया इस प्रकार होती है. पहले तुहर में पति एक बार ‘तलाक़’ कहता है और एक महीने प्रतीक्षा की जाती है. अगर सुलह हो जाए तो तलाक़ ख़ुद ही रद्द हो जाता है. अगर सुलह नहीं होती तो दूसरे तुहर में पति दूसरी बार ‘तलाक़’ कहता है और फिर एक महीने का समय दिया जाता है. अगर तब भी समझौता नहीं होता तो तीसरे तुहर में पति तीसरी बार ‘तलाक़’ कहता है, जिससे तलाक़ पक्का हो जाता है.”

जानकारों का कहना है कि तलाक़-ए-हसन की विशेषता यह है कि इसमें जल्दबाज़ी या भावनात्मक आवेग की जगह विचार, सुधार और बातचीत का अवसर मिलता है.

कई इस्लामी विद्वान इसे अधिक न्यायसंगत और परिवार-हितैषी तरीक़ा बताते हैं क्योंकि यह तलाक़-ए-बिद्दत की तरह अचानक और अपूरणीय नहीं होता.

उनका कहना है तलाक़-ए-हसन एक वैध, संवैधानिक और धार्मिक रूप से स्वीकार्य प्रक्रिया है. भारत सहित कई देशों में मुस्लिम महिलाओं ने इस तरीक़े को अपेक्षाकृत सुरक्षित माना है क्योंकि इसमें समय मिलता है और पति को सोचने का मौक़ा मिलता है कि क्या शादी को बचाया जा सकता है.

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